जटायु का शौर्य और रावण से युद्ध
जब रावण माता सीता का अपहरण कर आकाश मार्ग से लंका की ओर ले जा रहा था, तब दण्डकारण्य के मार्ग में गिद्धराज जटायु ने उन्हें देखा। जटायु दशरथ के मित्र थे। उन्होंने रावण को ललकारा और कहा कि एक स्त्री का बलपूर्वक अपहरण करना अधर्म है। रावण ने उपेक्षा की, तो जटायु ने क्रोधित होकर रावण के रथ पर आक्रमण कर दिया। जटायु ने अपने तीखे पंजों और चोंच से रावण के रथ के घोड़े मार गिराए, सारथी को मार डाला और रावण के मुकुट को खंडित कर दिया। अंत में, रावण ने अपनी खड्ग (तलवार) से जटायु के दोनों पंख काट दिए। जटायु रक्त से लथपथ होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। जब श्रीराम और लक्ष्मण सीता की खोज करते हुए उस स्थान पर पहुँचे, तो जटायु ने उन्हें रावण द्वारा सीता को दक्षिण दिशा की ओर ले जाने का अंतिम समाचार दिया और प्राण त्याग दिए। श्रीराम ने पिता के समान जटायु का दाह-संस्कार किया।
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रघुकुल वंशावली
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